पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार इजाफा, 10 दिन में तीसरी बार बढ़े रेट

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देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से आम लोगों की चिंता बढ़ गई है। बीते 10 दिनों के भीतर तीसरी बार ईंधन के दाम बढ़ाए गए हैं, जिससे परिवहन और रोजमर्रा की जरूरतों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका जताई जा रही है। ताजा संशोधन के तहत पेट्रोल की कीमत में 87 पैसे प्रति लीटर और डीजल में 91 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि की गई है। नई दरें लागू होने के बाद देश के कई शहरों में ईंधन के दाम नए स्तर पर पहुंच गए हैं, जबकि स्थानीय टैक्स और वैट के कारण अलग-अलग राज्यों में कीमतों में कुछ अंतर देखने को मिल रहा है।

ईंधन की कीमतों में यह लगातार वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रमों ने वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई है, जिसके कारण कच्चे तेल के दाम ऊंचे बने हुए हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल विपणन कंपनियों ने बढ़ी हुई लागत को ध्यान में रखते हुए कीमतों में संशोधन किया है।

बताया जा रहा है कि इससे पहले भी हाल के दिनों में दो बार पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए जा चुके हैं। पहले चरण में प्रति लीटर करीब 3 रुपये की वृद्धि की गई थी, जबकि दूसरी बार लगभग 90 पैसे तक कीमतें बढ़ी थीं। अब तीसरी वृद्धि के बाद कुल मिलाकर ईंधन की लागत में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है, जिससे महंगाई पर असर पड़ने की आशंका भी तेज हो गई है। विशेष रूप से माल ढुलाई, सार्वजनिक परिवहन और कृषि क्षेत्र में लागत बढ़ने से खाद्य वस्तुओं तथा अन्य आवश्यक सामानों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

आर्थिक जानकारों का कहना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। परिवहन महंगा होने से वस्तुओं की सप्लाई लागत बढ़ती है, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है। ऐसे में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो आने वाले दिनों में ईंधन की कीमतों में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जिससे महंगाई और उपभोक्ता खर्च पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।

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