शिक्षा से समझौता नहीं: सुप्रीम कोर्ट बोला- सुविधाओं की कमी से स्कूल न छोड़ें लड़कियां

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छात्राओं की शिक्षा और मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को लेकर Supreme Court of India ने केंद्र सरकार को कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि सैनिटरी नैपकिन और स्कूलों में अलग तथा कार्यशील शौचालयों की कमी किसी भी लड़की की पढ़ाई छूटने का कारण नहीं बननी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल बुनियादी सुविधाओं के अभाव में छात्राओं को शिक्षा छोड़ने या घर तक सीमित रहने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे को लड़कियों की गरिमा, स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए केंद्र सरकार को अपने पूर्व निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने चिंता जताई कि देश के कई हिस्सों में मासिक धर्म स्वच्छता और साफ-सुथरे, सुरक्षित शौचालयों की कमी अब भी छात्राओं की नियमित पढ़ाई में बाधा बनती है। न्यायमूर्ति J. B. Pardiwala और न्यायमूर्ति R. Mahadevan की पीठ ने कहा कि शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है और किसी भी लड़की को केवल आधारभूत सुविधाओं के अभाव में स्कूल छोड़ने की स्थिति में नहीं पहुंचना चाहिए। अदालत ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी सुविधाएं केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन और बेहतर शिक्षा से जुड़ा अधिकार हैं।

दरअसल, इसी वर्ष 30 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को स्कूलों में छात्राओं के लिए नि:शुल्क सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने और लड़कों व लड़कियों के लिए अलग-अलग, साफ तथा कार्यशील शौचालय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। अदालत ने यह भी कहा था कि मासिक धर्म स्वच्छता को स्वास्थ्य, शिक्षा और संविधान के तहत गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार के व्यापक दायरे में देखा जाना चाहिए। साथ ही स्कूलों में स्वच्छ पानी, साफ शौचालय और मासिक धर्म प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया गया था।

ताजा सुनवाई में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को आदेशों के अनुपालन की निगरानी जारी रखने और राज्यों से नियमित रिपोर्ट लेने को कहा है। अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले में समय-समय पर समीक्षा की जाएगी ताकि देश के किसी भी हिस्से में कोई छात्रा केवल सैनिटरी नैपकिन, स्वच्छ पानी या शौचालय की कमी के कारण अपनी पढ़ाई छोड़ने को मजबूर न हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन निर्देशों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है, तो इससे छात्राओं की स्कूल उपस्थिति बढ़ सकती है, ड्रॉपआउट दर घट सकती है और शिक्षा में लैंगिक समानता को और मजबूती मिल सकती है।

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