इज़रायल–क़तर तनाव कम करने की कोशिश: व्हाइट हाउस की पहल पर नेटन्याहू का माफ़ीनामा

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इज़रायल और क़तर के बीच हाल ही में बढ़े तनाव ने पूरे मध्य-पूर्व और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को प्रभावित किया था। दरअसल, 9 सितंबर को इज़रायल की ओर से क़तर की राजधानी दोहा में किए गए हवाई हमले ने दोनों देशों के रिश्तों को गंभीर संकट में डाल दिया। इज़रायल का दावा था कि यह हमला हमास के नेताओं को निशाना बनाने के लिए किया गया, लेकिन इसमें क़तर के एक सुरक्षाकर्मी समेत कई लोगों की मौत हुई और कई घायल भी हुए। इस घटना को क़तर ने अपनी संप्रभुता का खुला उल्लंघन बताया और तुरंत सभी मध्यस्थता गतिविधियों को निलंबित कर दिया। यह कदम गाज़ा युद्ध में बंदियों की रिहाई और युद्धविराम की संभावना पर गहरा असर डाल रहा था।

इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पहल की और 29 सितंबर को व्हाइट हाउस से इज़रायल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेटन्याहू और क़तर के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुल्रहमान अल थानी के साथ तीन-तरफ़ा टेलीफोन कॉल की व्यवस्था करवाई। इस बातचीत में नेटन्याहू ने दोहा हमले को लेकर गहरी खेद व्यक्त करते हुए माफ़ी माँगी और माना कि इज़रायल ने क़तर की संप्रभुता का उल्लंघन किया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भविष्य में इस तरह की घटनाएँ नहीं दोहराई जाएँगी।

बातचीत के दौरान ट्रम्प ने दोनों नेताओं से अपील की कि वे संवाद और सहयोग के रास्ते पर लौटें। इसके बाद तीनों पक्षों ने एक नए ‘त्रिपक्षीय तंत्र’ (Trilateral Mechanism) बनाने पर सहमति जताई, जिसका उद्देश्य भविष्य में बेहतर संचार बनाए रखना और गलतफहमियों को रोकना है। इस तंत्र से क़तर की मध्यस्थता भूमिका को फिर से सक्रिय करने की उम्मीद जताई जा रही है, ताकि गाज़ा संघर्ष में बंदियों की रिहाई और संभावित युद्धविराम समझौते की दिशा में प्रगति हो सके।

विशेषज्ञों के अनुसार यह माफ़ी सिर्फ़ प्रतीकात्मक कदम नहीं है, बल्कि व्यावहारिक मजबूरी भी है। गाज़ा युद्ध में हमास के साथ बातचीत और बंधकों की रिहाई में क़तर की भूमिका बेहद अहम है। इज़रायल यदि क़तर से दूरी बनाए रखता, तो शांति प्रक्रिया और मध्यस्थता पूरी तरह ठप हो सकती थी। इसी कारण नेटन्याहू ने यह राजनीतिक जोखिम उठाया, हालाँकि इज़रायल की घरेलू राजनीति में इस पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी समूहों ने इसे ‘अपमानजनक’ बताया और क़तर को आतंकवाद समर्थक देश करार देते हुए आलोचना की। वहीं, सरकार और कूटनीतिक हलकों में इसे एक आवश्यक समझौता माना जा रहा है।

अमेरिका के लिये भी यह पहल काफ़ी अहम है। राष्ट्रपति ट्रम्प अपने शांति-योजना को आगे बढ़ाना चाहते हैं और उन्होंने नेटन्याहू पर दबाव डाला कि वह क़तर के साथ रिश्तों को सुधारें। कई अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह कदम ट्रम्प की ‘व्यावहारिक कूटनीति’ का हिस्सा है, जिसमें वह इज़रायल को अलगाव से बाहर निकालकर फिर से क्षेत्रीय बातचीत में शामिल करना चाहते हैं।

अब सवाल यह है कि क्या यह माफ़ी गाज़ा युद्ध में शांति की राह खोल पाएगी? क़तर की मध्यस्थता को फिर से सक्रिय करना निश्चित तौर पर एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह अकेला कदम पर्याप्त नहीं होगा। हमास की प्रतिक्रिया, फिलिस्तीनी नेतृत्व का रुख़ और क्षेत्रीय शक्तियों जैसे ईरान की स्थिति भी निर्णायक भूमिका निभाएगी। रिपोर्टों के मुताबिक़ क़तर ने संकेत दिया है कि वह मध्यस्थता फिर से शुरू करने को तैयार है, लेकिन इसके लिये भरोसे का माहौल बनाना अभी बाकी है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस घटनाक्रम पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है। कई देशों ने इज़रायल–क़तर संवाद को एक सकारात्मक विकास बताया है, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने दोहा हमले की कड़ी निंदा की थी। उनका कहना है कि किसी भी सूरत में नागरिकों और मध्यस्थों की सुरक्षा को खतरे में डालना शांति प्रक्रिया को और कठिन बना देता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या त्रिपक्षीय तंत्र से व्यावहारिक स्तर पर बंदियों की रिहाई और युद्धविराम की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे या नहीं।

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