वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद और संभावित टैरिफ खतरों के बीच प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव शक्तिकांत दास ने आत्मनिर्भरता को भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत “आर्थिक कवच” बताया है। बिबेक देबरॉय मेमोरियल लेक्चर में संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि दुनिया में बहुपक्षीय व्यवस्था कमजोर हो रही है और कई देश व्यापार नीति को रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे माहौल में आत्मनिर्भरता भारत के लिए केवल एक नीतिगत नारा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा की रणनीति है।
शक्तिकांत दास ने स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत करना, जरूरी वस्तुओं और तकनीकों में विदेशी निर्भरता को कम करना और सप्लाई चेन को अधिक सुरक्षित बनाना है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर टैरिफ बढ़ने और व्यापार बाधाएं खड़ी होने से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर सीधा असर पड़ता है, लेकिन भारत ने समय रहते अपनी नीतियों के जरिए अर्थव्यवस्था को अधिक लचीला और मजबूत बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
उनके अनुसार आज की दुनिया में पारंपरिक बहुपक्षीय सहयोग पहले जैसा प्रभावी नहीं रहा है और कई देशों की व्यापार नीतियां वैश्विक बाजार में अस्थिरता पैदा कर रही हैं। ऐसे में भारत एक संतुलित रास्ता अपना रहा है, जहां वह नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का समर्थन भी करता है और साथ ही घरेलू उद्योग, मैन्युफैक्चरिंग, तकनीक और बुनियादी ढांचे को मजबूत कर आत्मनिर्भरता को बढ़ावा भी दे रहा है।
शक्तिकांत दास ने यह भी कहा कि आत्मनिर्भरता से न केवल संकट के समय देश को स्थिरता मिलती है, बल्कि यह दीर्घकालिक विकास को भी मजबूत आधार देती है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, निर्यात को बढ़ावा मिलता है और अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों से बेहतर तरीके से निपट पाती है। उनके मुताबिक मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में आत्मनिर्भरता भारत के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी और देश को आने वाली आर्थिक चुनौतियों से सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाएगी।




