नियमों की अनदेखी या सामाजिक न्याय? दलित-OBC मठों को जमीन देने पर बहस

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बेंगलुरु, 26 जनवरी 2026: कर्नाटक की कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के एक फैसले ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सरकार पर आरोप है कि उसने नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हुए बेंगलुरु में 22 दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के मठों को करीब 255 करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी जमीन आवंटित कर दी। यह फैसला सामने आते ही प्रशासनिक हलकों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का विषय बन गया है।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार यह जमीन उत्तर बेंगलुरु के दासनपुरा–रावुत्तनहल्ली क्षेत्र में स्थित है। इसमें सर्वे नंबर 57 की लगभग 34 एकड़ 9 गुंटा और सर्वे नंबर 58 की करीब 18 एकड़ 5 गुंटा भूमि शामिल है। इस इलाके की बाजार कीमत को देखते हुए कुल मूल्य लगभग 255 करोड़ रुपये आंका गया है। आरोप है कि यह जमीन पहले गोमाला (चरागाह) भूमि के रूप में दर्ज थी, जिसे नियमानुसार निजी या अर्ध-निजी संस्थाओं को आवंटित नहीं किया जाना चाहिए।

विवाद की सबसे बड़ी वजह यह है कि संबंधित विभागों—जैसे वित्त, कानून और संसदीय कार्य विभाग—ने पहले ही इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई थी। अधिकारियों ने चेतावनी दी थी कि शहरी सीमा के भीतर स्थित ऐसी जमीन का उपयोग सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए होना चाहिए, न कि मठों या संस्थाओं को देने के लिए। इसके बावजूद सरकार ने इन आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए आवंटन को मंजूरी दे दी, जिसे नियमों का उल्लंघन बताया जा रहा है।

सरकार की ओर से इस फैसले का बचाव करते हुए कहा गया है कि यह कदम सामाजिक न्याय और दलित-OBC सशक्तिकरण की नीति के तहत उठाया गया है। सरकार का तर्क है कि संबंधित मठ सामाजिक, शैक्षणिक और कल्याणकारी गतिविधियों से जुड़े हैं और उन्हें अपने कार्यों के विस्तार के लिए जमीन की आवश्यकता थी। वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि सामाजिक न्याय की आड़ में सरकारी संपत्ति का गलत तरीके से वितरण किया गया है।

आलोचकों का यह भी कहना है कि यह मामला मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से जुड़े पूर्व के भूमि विवादों की पृष्ठभूमि में और गंभीर हो जाता है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि बार-बार ऐसे फैसले सरकार की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह मुद्दा आने वाले समय में कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर सरकार के लिए चुनौती बन सकता है।

कुल मिलाकर, 255 करोड़ रुपये की जमीन के इस आवंटन ने कर्नाटक में नियम-कानून, भूमि उपयोग नीति और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन को लेकर तीखी बहस को जन्म दे दिया है, जिस पर अब पूरे राज्य की नजर टिकी हुई है।

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