उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनी रणनीति पर फिर से काम शुरू कर दिया है। हाल के समय में कुछ मुद्दों को लेकर पार्टी के भीतर और उसके पारंपरिक समर्थक वर्ग में नाराजगी के संकेत मिले हैं। खासकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से जुड़े नियमों और अन्य नीतिगत फैसलों को लेकर सवर्ण वर्ग के कुछ संगठनों तथा कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष की चर्चा सामने आई है। इसके अलावा संगठन के कई कार्यकर्ताओं ने भी लंबे समय से सक्रिय रहने के बावजूद पर्याप्त जिम्मेदारी या प्रतिनिधित्व न मिलने की शिकायतें उठाई हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए भाजपा नेतृत्व अब संगठन को फिर से सक्रिय और संतुलित बनाने की दिशा में कदम उठा रहा है।
सूत्रों के अनुसार पार्टी और आरएसएस दोनों स्तरों पर यह महसूस किया गया है कि यदि सभी सामाजिक वर्गों और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने की रणनीति अपनाई जाए तो आगामी चुनावों में बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। इसी कारण संगठन में फेरबदल, नए पदाधिकारियों की नियुक्ति और कार्यकर्ताओं को अधिक जिम्मेदारी देने की योजना पर काम किया जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि सवर्ण समाज के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और महिला वर्ग को भी संगठन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले, ताकि व्यापक सामाजिक संतुलन बनाया जा सके और किसी भी वर्ग में असंतोष की भावना न रहे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरण बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में भाजपा की नई रणनीति का उद्देश्य अपने पारंपरिक समर्थन आधार को मजबूत बनाए रखना और साथ ही अन्य समुदायों में भी अपनी पकड़ को बनाए रखना है। इसके लिए संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और विभिन्न वर्गों के बीच संवाद बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि इन कदमों के जरिए भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव में फिर से मजबूत प्रदर्शन की तैयारी कर रही है।




