केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि मौजूदा समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरे और तेज बदलाव के दौर से गुजर रही है, लेकिन भारत के पास इन झटकों का सामना करने की पूरी क्षमता है। उन्होंने कौटिल्य इकनॉमिक कॉन्क्लेव सहित कई मंचों पर बोलते हुए बताया कि भारत की आर्थिक मजबूती का आधार घरेलू मांग, निवेश और पिछले वर्षों में किए गए संरचनात्मक सुधार हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैदा होने वाली अनिश्चितताओं का तात्कालिक असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर उतना गहरा नहीं पड़ता।
सीतारमण ने कहा कि भारत की बैंकिंग व्यवस्था पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है और सरकारी पूंजीगत व्यय (कैपिटल एक्सपेंडिचर) को बढ़ाकर विकास की गति को बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है। इस वित्त वर्ष (2025–26) के लिए सरकार ने रिकॉर्ड स्तर पर पूंजीगत निवेश की घोषणा की है, जिससे न केवल बुनियादी ढांचे में सुधार होगा बल्कि घरेलू मांग और पूंजी निर्माण को भी बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि वित्तीय अनुशासन, निवेश में तेजी और सुधारों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक मंदी के दबावों के बावजूद स्थिर बनी रहेगी।
वित्त मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक व्यापार नीतियों में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता जैसे जोखिम बने हुए हैं। उन्होंने विशेष रूप से निर्यात क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों का उल्लेख किया और वित्तीय संस्थानों से आग्रह किया कि वे छोटे और मध्यम उद्योगों, कृषि तथा शिक्षा क्षेत्र को दिए जाने वाले ऋण में वृद्धि करें। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि ऋण की गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए ताकि घरेलू अर्थव्यवस्था टिकाऊ और संतुलित बनी रहे।
सीतारमण ने वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि संरचनात्मक असंतुलन और नीतिगत अनिश्चितताओं से निपटने के लिए बहुपक्षीय संवाद और साझेदारी बेहद अहम है। उनके अनुसार, भारत न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने में सक्षम है, बल्कि वैश्विक स्तर पर स्थिरता और समावेशिता बढ़ाने में भी योगदान देने को तैयार है। उनके इन बयानों से निवेशकों और आम जनता को यह संदेश देने की कोशिश की गई कि सरकार समय रहते जोखिमों को पहचान रही है और आवश्यक कदम उठाकर देश की विकास गति को स्थिर बनाए रखेगी।




