चेन्नई में भाषा शहीद दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने हिंदी भाषा को लेकर अपनी पार्टी और राज्य की स्पष्ट व पुरानी नीति को दोहराया। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में हिंदी को “न तब, न अब और न ही आगे कभी” कोई जगह दी जाएगी। स्टालिन ने यह बयान तमिल भाषा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दिया और कहा कि तमिलनाडु की पहचान, संस्कृति और आत्मसम्मान तमिल भाषा से जुड़ा हुआ है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि तमिलनाडु ने हमेशा भाषा के नाम पर किसी भी प्रकार के दबाव या थोपे जाने का विरोध किया है। उनके अनुसार, राज्य के लोगों ने ऐतिहासिक रूप से तमिल भाषा की रक्षा के लिए संघर्ष किया है और यह संघर्ष केवल अतीत की बात नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रतिबद्धता भी है। उन्होंने दो टूक कहा कि तमिलनाडु बहुभाषी देश भारत का हिस्सा होने के बावजूद अपनी मातृभाषा के अधिकारों से कोई समझौता नहीं करेगा।
एम.के. स्टालिन ने केंद्र सरकार की नीतियों पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि हिंदी को बढ़ावा देने या अनिवार्य बनाने की किसी भी कोशिश का तमिलनाडु में विरोध किया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि नई शिक्षा नीति और तीन-भाषा फार्मूले के नाम पर हिंदी को आगे बढ़ाने के प्रयासों से क्षेत्रीय भाषाओं की स्वायत्तता और समानता को नुकसान पहुंच सकता है, जिसे राज्य स्वीकार नहीं करेगा।
भाषा शहीद दिवस हर साल 25 जनवरी को मनाया जाता है, जो 1960 के दशक में हुए हिंदी विरोधी आंदोलनों और तमिल भाषा की रक्षा के लिए दिए गए बलिदानों की याद दिलाता है। इस अवसर पर स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु केवल अपनी भाषा के संरक्षण की बात नहीं करता, बल्कि देश की भाषाई विविधता और संघीय ढांचे की भावना की भी रक्षा करता है। उनका यह बयान एक बार फिर भाषा को लेकर केंद्र और तमिलनाडु के बीच जारी वैचारिक मतभेदों को सामने लाता है।




