मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हस्तक्षेप से मुरादाबाद की एक बच्ची को आखिरकार निजी स्कूल में दाखिला तो मिल गया, लेकिन अब स्कूल की महंगी किताबें और ड्रेस उसके परिवार के लिए सिरदर्द बन गई हैं।
तीन महीने बाद मिला दाखिला
रैपिडो चालक अमित कुमार की बेटी को स्कूल में दाखिले के लिए तीन महीने संघर्ष करना पड़ा। जब सारी कोशिशें नाकाम हो गईं, तब मुख्यमंत्री कार्यालय में की गई शिकायत पर सीएम योगी ने संज्ञान लिया। आदेश के बाद बच्ची को सीएल गुप्ता वर्ल्ड स्कूल में दाखिला मिल गया।
आरटीई के तहत सीट मिली, पर खर्च भारी
हालांकि बच्ची को नर्सरी क्लास में आरटीई (Right to Education) कोटे के तहत एडमिशन मिला, लेकिन अब स्कूल की किताबें, ड्रेस और अन्य जरूरी सामग्री का खर्च परिवार के लिए बहुत बड़ा बोझ बन गया है।
“हमने सोचा कि दाखिला मिल जाएगा तो पढ़ाई शुरू हो जाएगी, पर अब स्कूल की ड्रेस और किताबें ही नहीं जुटा पा रहे।”
— अमित कुमार, बच्ची के पिता
₹14,000 से ज्यादा का खर्च
स्कूल यूनिफॉर्म, किताबें, बैग और स्टडी मैटेरियल समेत कुल खर्च करीब ₹14,000 तक पहुंच गया है। सीमित आमदनी वाले परिवार के लिए यह रकम जुटाना बेहद कठिन हो गया है। ऊपर से तीन महीने का पिछड़ा कोर्स भी अब घर पर ही पूरा कराना है।
कोर्स में पिछड़ गई बच्ची
स्कूल टीचर्स का कहना है कि बच्ची तीन महीने पिछड़ चुकी है और ये गैप भरने की जिम्मेदारी अब माता-पिता की है। माता-पिता के पास संसाधन भी नहीं और समय भी नहीं, जिससे बच्ची की पढ़ाई में और बाधा आ रही है।
नीति पर उठे सवाल
सरकारी योजनाएं केवल सरकारी स्कूलों तक सीमित हैं, जबकि निजी स्कूलों में दाखिला मिलने के बाद बच्चों को किताबें और ड्रेस खरीदने के लिए कोई सरकारी सहायता नहीं दी जाती। ऐसे में आरटीई के उद्देश्य पर सवाल उठते हैं।




