सस्ती थाली का सपना क्यों टूट रहा है? जानिए सरकारी कैंटीन योजनाओं की असल कहानी

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भारत में बीते एक दशक के दौरान सब्सिडी पर सस्ता और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कई सरकारी कैंटीन योजनाएं शुरू की गईं। तमिलनाडु की ‘अम्मा कैंटीन’ से लेकर राजस्थान की ‘अन्नपूर्णा रसोई’, कर्नाटक की ‘इंदिरा कैंटीन’, आंध्र प्रदेश की ‘अन्ना कैंटीन’ और दिल्ली की जन-आहार जैसी योजनाओं ने शहरी गरीबों, दिहाड़ी मजदूरों, प्रवासी कामगारों और जरूरतमंदों को राहत दी। इन योजनाओं का मूल मकसद था कि कम आय वर्ग को न्यूनतम कीमत पर तैयार भोजन मिल सके, ताकि भूख और कुपोषण जैसी समस्याओं से निपटा जा सके।

सबसे पहले व्यापक स्तर पर इस मॉडल की शुरुआत तमिलनाडु में वर्ष 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता द्वारा ‘अम्मा कैंटीन’ के रूप में की गई। यहां बेहद कम कीमत पर नाश्ता, दोपहर और रात का भोजन उपलब्ध कराया जाता था। इस योजना की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि देश के कई अन्य राज्यों ने इसे अपनाया और अपने-अपने नाम से ऐसी कैंटीन योजनाएं शुरू कीं। शुरुआती वर्षों में इन योजनाओं को अच्छा जनसमर्थन मिला और लाखों लोगों को रोजाना सस्ता भोजन उपलब्ध कराया गया।

हालांकि समय के साथ इन योजनाओं के सामने कई चुनौतियां उभरने लगीं। सबसे बड़ा कारण राजनीतिक बदलाव रहा। कई राज्यों में सरकार बदलते ही पूर्ववर्ती सरकार की योजनाओं को प्राथमिकता सूची से बाहर कर दिया गया। कहीं इन्हें पूरी तरह बंद कर दिया गया तो कहीं नाम बदलकर या बजट घटाकर सीमित रूप में चलाया गया। आंध्र प्रदेश में अन्ना कैंटीन और कुछ अन्य राज्यों में ऐसी योजनाओं का भविष्य राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर होता दिखा, जिससे इनकी निरंतरता प्रभावित हुई।

दूसरा बड़ा कारण आर्थिक बोझ और बढ़ती सब्सिडी लागत रही। महंगाई बढ़ने के साथ-साथ कच्चे माल, गैस, कर्मचारियों और रखरखाव का खर्च भी बढ़ता गया। कई राज्य सरकारों के लिए लंबे समय तक भारी सब्सिडी देना मुश्किल होता चला गया। बजट की कमी के कारण कई जगहों पर कैंटीन संचालकों को समय पर भुगतान नहीं हो पाया, जिससे संचालन बाधित हुआ और कई कैंटीन अस्थायी या स्थायी रूप से बंद करनी पड़ीं।

प्रशासनिक और संचालन संबंधी समस्याएं भी इन योजनाओं के कमजोर पड़ने की बड़ी वजह बनीं। भोजन की गुणवत्ता, साफ-सफाई, नियमित आपूर्ति, कर्मचारियों की कमी और निगरानी तंत्र के अभाव जैसी शिकायतें सामने आती रहीं। कुछ जगहों पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप भी लगे, जिससे सरकारों को इन योजनाओं पर दोबारा विचार करना पड़ा। कई कैंटीन केवल कागजों में चलती रहीं, जबकि जमीनी स्तर पर उनका लाभ सीमित हो गया।

इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में अपेक्षित संख्या में लाभार्थी नहीं आने से भी योजनाएं घाटे का सौदा बन गईं। जहां लक्ष्य समूह तक सही तरीके से पहुंच नहीं बन पाई, वहां लागत और उपयोग के बीच संतुलन बिगड़ गया। ऐसे में सरकारों ने इन योजनाओं को जारी रखने के बजाय अन्य कल्याणकारी विकल्पों पर ध्यान देना ज्यादा उपयुक्त समझा।

इसके बावजूद सभी सब्सिडी वाली सरकारी कैंटीन पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। राजस्थान की अन्नपूर्णा रसोई जैसी कुछ योजनाएं आज भी किसी न किसी रूप में जारी हैं, जबकि दिल्ली में नई ‘अटल कैंटीन’ योजना के जरिए फिर से सस्ते भोजन की पहल की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रवासी मजदूरों और शहरी गरीबों के लिए ऐसी कैंटीन योजनाएं आज भी बेहद जरूरी हैं, क्योंकि राशन प्रणाली कच्चा अनाज तो देती है, लेकिन तैयार और पौष्टिक भोजन का विकल्प नहीं देती।

कुल मिलाकर, अम्मा कैंटीन से लेकर अन्नपूर्णा रसोई तक का सफर यह दिखाता है कि सब्सिडी वाली सरकारी कैंटीन योजनाएं सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से अहम हैं, लेकिन इन्हें लंबे समय तक सफलतापूर्वक चलाने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त बजट, पारदर्शी संचालन और निरंतर निगरानी बेहद जरूरी है। बिना इन आधारों के ऐसी योजनाएं धीरे-धीरे बंद होने को मजबूर हो जाती हैं।

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